बागों में अब फूल कहाँ हैं , तोड़ लिए सब माली ने ।

एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।


तेरा मंदिर तुझे सलामत मैं भौरा आवारा हूँ ।

इकलौता श्रृंगार मैं उसका फिरता मारा मारा हूँ ।

वफ़ा कहूँ या खता मैं उसकी छीन लिए स्वर माली ने ।

एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।


पत्थर की मूरत में बेशक हृदय नहीं हो सकता है ।

जिसने मेरा मरम ना जाना हरि नहीं हो सकता है ।

उड़ने की ख्वाहिश थी संग संग काट लिए पर माली ने ।

एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।


बाग बगीचों की पीड़ा का तनिक ना तुमको भान हुआ ।

बिन राधा के मोहन का वो हर लम्हा बेजान हुआ ।

तड़प रहा हूँ सांसों के बिन छीन लिए धड़ माली ने ।

एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।


बागों में अब फूल कहाँ हैं , तोड़ लिए सब माली ने ।

एक मूरत को खुश करने में लूट लिए घर माली ने ।


✍ धीरेन्द्र पांचाल