ससुरा के माड़ो के तू ही चनरमा ।।

मुँहवा फुलाय बाबू जईबा कहाँ ।

खाला खिचड़ी ए बबुआ खईबा कहाँ ।


बाथे कपार कहा मरचा घुमा दीं ।

गरमी लगत बा त बेना डोला दीं ।

साली सढ़ूआईन सब तोहे समझावे ,

खोदी सरहज त बबुआ लुकईबा कहाँ ।

खाला खिचड़ी ए बबुआ खईबा कहाँ ।


काहें खिसियाईल बाड़ा बोला तू हाली ,

सईकिल आ सिकड़ी के बात रहे खाली ,

हमनी के अइसे अँउजल जनि करा,

ना त मूसर के घुसर पचईबा कहाँ ।

खाला खिचड़ी ए बबुआ खईबा कहाँ ।


खाला हाली हाली तोहे अँगूठी पहिराय देब ।

हथवा के खातिर एगो घड़ियो मँगाय देब ।

सास ससुर बईठ सब तोहके मनावे ,

बाबू होखी निरदईया जईबा कहाँ ।

खाला खिचड़ी ए बबुआ खईबा कहाँ ।


ससुरा के माड़ो के तू ही चनरमा ।।

मुँहवा फुलाय बाबू जईबा कहाँ ।

खाला खिचड़ी ए बबुआ खईबा कहाँ ।


✍️ धीरेन्द्र पांचाल