फ़ुरसत मे कभी किसी रोज तुझसे,मिलते हैं ज़िन्दगी शिकवे होंगे तुझे भी हैं मुझे भी,बात करते हैं ज़िन्दगी अकेला थक गया हूँ मैं चलते-चलते तेरी राहो मे कुछ पल के लिए ही सही,साथ चलते हैं ज़िन्दगी वो जो लिखे थे मैंने तेरे नाम तनहायी मे आ बैठ पास वो दो चार ख़त,साथ पढ़ते हैं ज़िन्दगी ना मै तेरा क़ातिल ना तुझे दुश्मनी है मुझसे फ़िर क्यों युँ बात-बात पे हर बार लड़ते हैं ज़िन्दगी आते ही ज़िद क्यों है तुझे मुझसे दूर जाने की ठहर जरा, कुछ पल के लिए दोस्त बनते हैं ज़िन्दगी ख़ैर आदत हो चुकी है तेरे बग़ैर जीने की आ फ़िर से वो बचपन वाली कट्टी करते हैं ज़िन्दगी आ कभी दिन किसी रोज तुझसे,मिलते हैं ज़िन्दगी शिकवे होंगे तुझे भी हैं मुझे भी,बात करते हैं ज़िन्दगी