जब कभी रिश्तों की गुत्थियां

उलझ उलझ जाती हैं

तो माँ जाने कब

चुपके से.....

पास चली आती है।

मेरे ख्यालों में उभरती है

एक पुरानी तस्वीर,

जिसमे "मेरी उम्र"की माँ

बैठी नज़र आती है।

उधड़े रिश्तों को

प्रेम से सिलती हुई माँ

फटे रिश्तों में पैबंद

'क्षमा' का लगाती है।

सारे रिश्तों को करीने से

सहेजे हुए मेरी माँ

मेरी उलझन को दे सुलझन

मुस्काती है।

मैं भी जुट जाती हूँ तभी

रिश्तों की तुरपाई में

मेरी खोई हंसी

होंठों पे लौट आती है।

और माँ जाने कब

चुपके से.... धीरे से

मुझे नयी राह दिखा

दूर चली जाती है।

** धीरजा शर्मा**