मेरा हंसना भी तूने हुसून समझा,

मेरा रोना तूने अपना समझा,

यादें तो औरो की भी होगी तुम्हारी,

पर तूने मोहब्बत को मोहबत समझा।

राहें भटकता– भटकता एक मुसाफिर बना।


चुगलियों को मिलना समझना पड़ता है,

मधुशाला को धर्म शाला समझना पड़ता है ,

आधुनिकता में जीने की राहें पकड़े बैठे हैं,

कंस को भी कृष्ण समझना पड़ता है,


वो हवा भी मेरे कान के पास से गुजरती है,

जो तेरे से रूठकर दूर गई है,

अपना तेवर कम कर लो, गौरी!

वरना, प्यार की ट्रेन भी तेरे से गुजरती है।


–धर्मवीर राईका