उस दिन में सन्न था मेरा मन खिन्न था

खेत में नही था अन्न सिर्फ उसका चिन्ह था

उन्नत होती हरी भरी खेती ही तो मेरी पहचान थी

उसमें पैदा होती लहलहाती फसल ही तो मेरी जान थी

जब फसल ही न उगती तो उसकी लागत कौन भरता

मैं  आत्महत्या न करता तो क्या करता |1|

मेरी पत्नी थीबच्चे थे जिनमें बिटिया सबसे बड़ी थी

जो सालों से सपने संजोये शादी की पंक्ति में खड़ी थी

बूढी माँ और पत्नी मुझसे कहतीं कुछ करो कुछ करो

कुछ भी हो कैसे भी हो उस लडकी के हाथ पीले करो

इस फूटी कंगाली में लडके वालों को दहेज कौन धरता

मैं  आत्महत्या न करता तो क्या करता |2|

लाला जी से कर्जा ले कर मैंने फसल उगाई थी

खेती ही तो करता था और कौन सी मेरी कमाई थी

न पानी बरसा न फसली उगी न लौटा पैसा

हालत फिर भी न सुधरी रहा जैसे का तैसा

दाने दाने को मोहताज किसान फिर भी ये न करता

मैं  आत्महत्या न करता तो क्या करता ||

पता था तुम मुझे कहोगे कि में जिम्मेदारी से भाग गया

हुंह तुम्हारी मैली सोच मानो में ही अपनी फसल उजाड़ गया

कहना आसान है लेकिन उसको करना बहुत मुश्किल

मुझे दोष देने के वजाय जाओ निकालो कोई ढंका हल

मुझे शौक नही जो घरवालों को अकेला छोड़ मरता

मैं  आत्महत्या न करता तो क्या करता |4|

मर गया कम से कम अब तो चैन से रहने दो

किसान का जो दर्द है जरा उसे भी तो कहने दो

आज तुमने न सुनी तो देख लेना कुछ और मरेंगे

न चाहते हुए जो में कर गया वे सब भी वही करेंगे

साहब कोई शौक से जीवन नष्ट नही करता

मैं  आत्महत्या न करता तो क्या करता |5|