काविता


"किसान हूँ मै"

"

सिसक सिसक कर रोए,

दरके धरती,नीर उबले,

पोखर तालाब सब सूखे,

सूरज धरती एक सीध में,

दिन दुपहरी,जब धूप चढ़े,

ऐसी उत्कट ज्वाला में,

जलाता हूँ मै ,

किसान हूँ मै ,

दुनिया चक्की,

आटा हूँ मै ...


खाली अम्बर वीरान लगे ,

सूनी गालियाँ बयार चले,

जेठ की दुपहरिया में,

बेदम हो चली है सांसे,

अतड़ी पेट से है चिपटे ,

लहू बून्द पसीना बनके,

टपका हूँ मै ,

किसान हूँ मै ,

दुनिया चक्की,

आटा हूँ मै ...


फसल पड़ी है पूरी खेत में ,

कब मौसम खेल बिगाड़े,

वक़्त बेवक्त की बारिश से ,

हाँथ में हसुली,साफा सर पे,

फसल काट रहा हूँ मै ,

किसान हूँ मै ,

दुनिया चक्की,

आटा हूँ मै ...


घर के अंदर छाव में ,

जब दुनिया चैन से सोए ,

चिड़िया भी न मुन्नाए

कुत्ता भी न गुगु आए ,

आती हुई लू की थपेड़े ,

खाता हूँ मै ,

किसान हूँ मै ,

दुनिया चक्की,

आटा हूँ मै ...


आस है की जाये नहीं मन से,

बड़वाग्नि सी लगी है पेट में,

बीज बहड़ी उरिया डी ए पी ,

बराबर भी दाम न मिले,

मुनाफे की बात कौन करे ,

फेरो दिन रात मरता हूँ मै,

किसान हूँ मै ,

दुनिया चक्की,

आटा हूँ मै..."

~धर्मेंद्र मिश्रा ~

www.dharmendramishra.com