"दीपक "


"एक दीप से अनेक दीप जले ,

तुम ही कहो वो दीप कौन बने ,


नतमस्तक हो अंधियारों के आगे,

 डर कर न खींच तू कदम पीछे ,


स्वार्थ सिद्धि है जीवन की अर्थी,

जीवन गर रण है तो बनो सारथी,


धेय कर स्वयं ही वो राह बनो ,

आंदोलित हो धवल पथ पे अडिग रहो,


आत्म वंचित मूर्छा अब तोड़ चलो ,

 कदम-कदम मंजिल की ओर बढे चलो ..."

~धर्मेंद्र मिश्रा

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