"आत्म चिंतन "
मन में सेवा भाव रखना ही एक तरह का विकार है.नकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है,सेवा भाव रखने वाले मनुष्य के अंदर स्वयं के प्रति श्रेष्ठता की भावना पनपने लगती है. मन में सेवा का भाव ,किसी की सेवा करना,दीन दुखियों की मदत करना ,एक जीव आत्मा का दूसरे जीवात्मा के प्रति लगाव होना स्वाभाविक भाव है .यह एक प्रकृति प्रदप्त भाव है ,हमारा कर्तव्य* है.जो हमें अनिवार्यत: करना चाहिए,यदि हम अपने कर्तव्य से विमुख होते है ,केवल मात्र जीवन में लेने का भाव रखते है ,समाज को, प्रकृति को कुछ देने का भाव मन में नहीं रखते, जोकी हमारे जीवन और प्रकृति में असंतुलन की स्थिति पैदा करती है.जैसे वृछ का काम ,फल और ऑक्सीजन देना है,जोकि उसका कर्तव्य है .इंन्सान का कर्तव्य इनके प्रति सहिष्णुता,सुरछा का भाव रखना आदि जोकि आवश्यक है प्रकृति में संतुलन के लिए.हर एक सजीव अपने जीवन में कर्म के बंधन ,दायित्व से बघा हुआ है,क्योकि वह चलायमान ऊर्जा द्वारा संचालित है. प्रकृति संतुलन को विस्तार से समझने की कोशिश करते है .चराचर जगत में मौजूद हर एक जीव ,निर्जीव प्रकृति में सामंजस के लिए परोछ, अपरोछ तौर पर उत्तरदायी है .सजीव और निर्जीव दोनों ही पदार्थ ऊर्जा से बधे हुए है ,परन्तु ऊर्जा को परिवर्तन करने की सक्ति केवल सजीव पदार्थ(जो जीवन धारण करता है ) के पास है,जिनके अंदर चलायमान ऊर्जा मौजूद है.विज्ञानं की भाषा में ऊर्जा दो तरह की होती है. स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा .ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जासकता ,इन दोनों ही अवस्थाओं में केवल परिवर्तनीय है.और परिवर्तन की सक्ति चलायमान ऊर्जा ,जिसे हम जीव आत्मा भी कहते है ,पर निर्भर है . इन दोनों ही उर्जाओ के मध्य संतुलन आवश्यक है,परन्तु वर्तमान में चलायमान ऊर्जा द्वारा ,जैसे तेजी से बढ़ता सहरीकरण,वनो का धीरे -धीरे कम होना,नदियों ,जलाशयों के जल का दूषित होना ,अपव्यय ,जलीय परिस्थिति तंत्र से सजीव ऊर्जा का कम होना, जमीन के अंदर मौजूद स्थीजित ऊर्जा को बाहर निकालना ,स्थितिज ऊर्जा के संचय को बढ़ावा देरही है, जिससे प्रकृति में असंतुलन की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है .स्थितिज ऊर्जा के आधीन चलायमान ऊर्जा का होना ,पृथ्वी को भीषण तबाही की तरफ मोड़ रही है.स्थितिज ऊर्जा गुण-दोष से रहित एक निर्पेच्छ ऊर्जा है .जो चराचर जगत में व्याप्त है और (पृथ्वी के बाहर सम्भवता ९९ फीसदी भाग में यही ऊर्जा विस्तारित है,हमारी आकाश गंगा के बाहर कुछ और भी ऐसे गृह है जहाँ सजीव ऊर्जा विद्यमान है ) सजीव ऊर्जा द्वारा बनाये गये सुरच्छा घेरे(ओज़ोन परत) को तोड़ने में समर्थ है . और ये घेरा टूटना अवश्वम्भावी* है.परन्तु लम्बे समय तक " इसे टाला जा सकता है.और यह संभव है यदि हम अपने आचरण,यम -नियम द्वारा सजीव ऊर्जा ,चलायमान ऊर्जा को प्रखर ,ओजस्वी रूप प्रदान कर स्थिज ऊर्जा के प्रति बढ़ती निर्भरता को कम कर सके. हमें स्वाध्यन की आवश्यकता है.स्वाध्यन से हमारे अंदर आत्मज्ञान का भाव आता है,हम स्वयं को जानने लगते है .जब हम स्वयं को जान जाते है ,अपनी ऊर्जा की सक्ति(Capacity of Energy) को पहचान जाते है तब हमारे अंदर स्वतः ही हर एक सजीव जीव आत्मा के प्रति समानता का भाव आजाता है. दोनों ही उर्जाओ के मध्य निर्बाध्य प्रवाह होगा ,जोकी जलीय और स्थलीय परिस्थि तंत्र, प्रकृति में संतुलन पैदा करने के लिए आवश्यक है . "यदि जीवन में स्वाध्यन का भाव हो तो नर्क को भी स्वर्ग बनाया जा सकता “


