Weekend पेशकश ।ग़ज़ल l
उम्र भर ....
कोई एक पल में याद रह गया उम्र भर,
कोई साथ में भी अजनबी रहा उम्र भर ।
किसी को दौलत किसी को शोहरत की तलाश थी,
मैं मुहब्बत ढूंढता रह गया उम्र भर।
उसे झूठ का इल्म आता था इस कदर,
मैं ऐतबार करता रह गया उम्र भर।
जब दर्द ना - काबिल - ए बर्दाश्त हो गया,
मैं अशआर में अश्क पिरो गया उम्र भर।
ज़माने को झूठ की आदत पड़ चुकी,
सच सुनाता ' धरम ' रह गया उम्र भर ।।
धर्मेंद्र ' धरम '
17.2.25

