मित्रो,पेश है इस सप्ताहांत की पेशकश मेरी नई ग़ज़ल :
रूप को ढलते हुए,धूप को पिघलते हुए,
देखा है हमने,ज़माना बदलते हुए।
गहरे उतरा वो जाना राज़ ए ज़िंदगी,
खड़ा था किनारे,वो रहा हाथ मलते हुए।
धरम,ईमान, उसूल सब देखे,
सियासत की आग में जलते हुए।
दो पल ' उनके ' पहलू में क्या गुजरे,
ज़माने को देखा करवट बदलते हुए।
अंधेरी रहगुज़र रोशन हो जाएंगी,
थाम लो जो हाथ,साथ चलते हुए।
हज़ार ख्वाबों की दास्तां जिंदगी 'धरम '
कुछ पूरे कुछ अधूरे,मचलते हुए।
रूप को ढलते हुए....
(धर्मेंद्र/13.8.23)

