कदम गिन-गिन कर यहां तक आये हैं

आप क्या सोचते हैं, लिखा कर लाये हैं


एक पत्थर भी राह का शेष नहींं रहा

जहां लहू अपना चढ़ा कर नहीं आये हैं


किसी ने हांथ मिलाया किसी ने झटका भी

आम और शिकंजी सब पीते हुए आये हैं