मिलेंगे फिर

किसी मोड़ पर,

कुछ रचते हुए नया

तोड़ते हुए कोई जमीन

गिराते हुए कोई दीवार

किसी हद की,

हम मिलेंगे।



मिलेंगे फिर

देखते हुए कोई सपना

किसी सपने में भरते हुए रंग

बनाते हुए कोई दुनिया

जहां नहीं होगी कोई जगह

ज़हालत की



जब बीत जाएगी रात

जब उजाला अपनी आंखों का होगा

जब टूट रही होंगी बेड़ियां

जब जीने के लिए

किसी की अनुमति की जरूरत नहीं होगी

हम तब मिलेंगे।