घर की बेरंग दीवारें भी बोलती हैं,
मतलब तब समझ आया, जब जाने का वक्त आया।
पिता की आंखों को जी भर देखने का मन किया,
पर कुछ कहने से पहले वो अंदर चला गया।
मां सब जानती थी, फिर भी चुप थी।
कहने को बहुत था, पर विदा हँसते हुए किया।
उस दिन के बाद बेटा लौटकर नहीं आया,
क्योंकि दीवारों पर अभी भी रंग बाकी था।
ये दीवारें सबके जीवन में होती हैं —
इन्हें रंगीन बनाना हमारा कर्तव्य है।
