प्रात:काल जब मेरे आंगन मे
तुम आती थी ||
अपनी मीठी सी चहचहाहट से
पूरा घर महकाती थीं||
दाना चुगने को ना मिलने पर चूँ चूँ कर
घर सर पर कर लेती थी ||
फिर अन्दर से जब
कुछ चावल के दाने मां ले आती ||
तो तुम बडे चाव से चुगती
और बच्चों को भी ले जाती थी ||
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क्या तुम्हें याद है------
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जब तुम आंगन मे
दाना चुगने आती थी ||
मैं नन्हे कदमों से दौडकर
तुम्हें पकडने आता
तुम फुर्र से उड जाती थीं
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इक बात बताओ -----
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तुम मेरे आंगन मे
अब क्यों नहीं आती ||
वो मीठी सी चहचहाहट
हमें क्यों नही सुनाती ||
क्या खता हुई
क्यों ख़फा हुई हमसे ||
तुम्हे याद भी है
नही आयी मेरे आंगन में
तुम कबसे??
गौरैया का जवाब--
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तो सुनो -----
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कैसे आऊँ
और सुनाऊँ वो मीठी सी चहचहाहट ---
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जिंदगी की दौड मे
तुम इस कदर खो गए ||
हमारी चहचहाहट संग
अपनी सभ्यता भी खो दिए ||
गांव छोडकर
तुम शहर चले आए ||
शहर से
हमारी मौत का सामान ले आए ||
मैं तो तेरे आंगन के
छत की मुंडेर पर आयी ||
तेरा ध्यान खींचने को
थी जोर से चहचहाई ||
किन्तु तुझ पर
कोई फर्क न पडा||
यह देख मेरा ह्रदय
फूट फूट कर रो पडा ||
पता है तुम्हें---
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तुम मोबाइल मे व्यस्त हो
गौरैया दिवस मना रहे थे ||
हर पल रेडिएसन बढा कर
मेरे मौत का द्वार खोले जा रहे थे ||
मैं कुछ नहीं भूली---
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पर तुम भूल गए ----
तुम्हारे घर का खपरैल
मेरा प्रिय स्थान था ||
तुम्हारे कच्चे घर की धन्नियों मे
मेरा भी छोटा सा इक मकान था ||
क्या तुम्हें याद है----
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कच्चा मकान गिरा कर
मेरा भी घर गिरा दिया ||
खुद का घर पक्का बनाकर
मुझे घर से निकाल दिया ||
अंतिम पैगाम -----
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मेरे लिए कुछ कर सको
तो मोबाइल का इस्तेमाल कम करना ||
अपनी छत पर घडे में
थोडा पानी रोख दिया करना||
सिर्फ गौरैया दिवस पर ही नही
मेरा हर रोज खयाल रखा करना ||
मेरा वादा हैै ----
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मै फिर आऊँगी ||
तुम्हें अपनी मीठी सी
चहचहाहट की मीठी धुन सुनाऊँगी