प्रात:काल जब मेरे आंगन मे तुम आती थी || अपनी मीठी सी चहचहाहट से पूरा घर महकाती थीं|| दाना चुगने को ना मिलने पर चूँ चूँ कर घर सर पर कर लेती थी || फिर अन्दर से जब कुछ चावल के दाने मां ले आती || तो तुम बडे चाव से चुगती और बच्चों को भी ले जाती थी || . क्या तुम्हें याद है------ ----------------------------------------- जब तुम आंगन मे दाना चुगने आती थी || मैं नन्हे कदमों से दौडकर तुम्हें पकडने आता तुम फुर्र से उड जाती थीं . इक बात बताओ ----- --------------------------------------- तुम मेरे आंगन मे अब क्यों नहीं आती || वो मीठी सी चहचहाहट हमें क्यों नही सुनाती || क्या खता हुई क्यों ख़फा हुई हमसे || तुम्हे याद भी है नही आयी मेरे आंगन में तुम कबसे?? गौरैया का जवाब-- --------------------------------- तो सुनो ----- ------------------- कैसे आऊँ और सुनाऊँ वो मीठी सी चहचहाहट --- --------------------------------------------------- जिंदगी की दौड मे तुम इस कदर खो गए || हमारी चहचहाहट संग अपनी सभ्यता भी खो दिए || गांव छोडकर तुम शहर चले आए || शहर से हमारी मौत का सामान ले आए || मैं तो तेरे आंगन के छत की मुंडेर पर आयी || तेरा ध्यान खींचने को थी जोर से चहचहाई || किन्तु तुझ पर कोई फर्क न पडा|| यह देख मेरा ह्रदय फूट फूट कर रो पडा || पता है तुम्हें--- ------------------------------- तुम मोबाइल मे व्यस्त हो गौरैया दिवस मना रहे थे || हर पल रेडिएसन बढा कर मेरे मौत का द्वार खोले जा रहे थे || मैं कुछ नहीं भूली--- ----------------------------------------- पर तुम भूल गए ---- तुम्हारे घर का खपरैल मेरा प्रिय स्थान था || तुम्हारे कच्चे घर की धन्नियों मे मेरा भी छोटा सा इक मकान था || क्या तुम्हें याद है---- ------------------------------------------ कच्चा मकान गिरा कर मेरा भी घर गिरा दिया || खुद का घर पक्का बनाकर मुझे घर से निकाल दिया || अंतिम पैगाम ----- ----------------------------------------- मेरे लिए कुछ कर सको तो मोबाइल का इस्तेमाल कम करना || अपनी छत पर घडे में थोडा पानी रोख दिया करना|| सिर्फ गौरैया दिवस पर ही नही मेरा हर रोज खयाल रखा करना || मेरा वादा हैै ---- --------------------------- मै फिर आऊँगी || तुम्हें अपनी मीठी सी चहचहाहट की मीठी धुन सुनाऊँगी