पिता होता सूरज की तरह
जो गर्म, तप्त सा दिखता है ,
लेकिन अपनी किरणों से
वो जीवन संचरित करता है।
होता है पिता पर्वत की तरह
वो कठोर हमेशा ही दिखता है,
लेकिन अपने सीने में वो, कई
भावों की बहती दरिया रखता है।
रखता है पिता समंदर से साम्य
जो खारा नमकीन सा लगता है,
लेकिन अपने गर्भ के भीतर वो,
कई रत्नों का पालन करता है।
पिता हवा के माफिक भी है,
जो जीवन संजीवनी लाती है,
हट जाए सर से हाथ पिता का
तब उनकी याद बहुत सताती है।
मुझे गर्व हमेशा अपने पिता पर
मैं जब भी टूटा उन्हें याद किया,
हर संकट में और हर विपदा में
उन्होंने हमेशा ही मेरा साथ दिया।
@देवकरण गंडास


