सृजन का ना नामो निशान रहा,
ना मजदूर रहा, ना किसान रहा,
कुछ शेष बचा तो वो भी कर ले
यहां धर्म बचा है, ना इंसान रहा।
भाई बन गया है भाई का दुश्मन,
और ना ही प्रेम का गुणगान रहा,
इंसानियत अब टेक रही है घुटने
बस हिन्दू, ईसाई, मुसलमान रहा।
हम एक ही हैं यह खुल के कह दे,
ना वो वेद पुराण और कुरान रहा,
सब झूठा बता रहे हैं एक दूजे को
अब ना अल्लाह, ना भगवान रहा।
सब मिल के बांटे सब की खुशियां,
नहीं ऐसा कोई भी एक मकान रहा,
सब आंख के होते भी अंधे बन बैठे
कभी था ये बाग, अब शमशान रहा।


