ख़ुद को तो रोक लूँगा , लफ़्ज़ आज हद कर जाएँगे । आज ये ज़ुबान की जगह आँखों से बह जायेंगे  तूने भी बख़ूबी फुसलाया है अपने नैनों को यूँ तेरे अश्क़ों की तरह आज हम भी टल जाएँगे चल खेलें खेल ये ख़ामोशी का एक दूसरे के साथ इस पल में कुछ कह गए तो बेवजह अफ़साने बन जाएँगे सुना है मुकम्मल ना होना है सच्चे इश्क़ की निशानी ख़ुश हूँ हम इस नई सी मोहब्बत की रस्म भी अदा कर जाएँगे लफ़्ज़ तो नए ले आयेंगे पर तराना वही गुनगुनाएँगे यादों की किताबों में एहसास की स्याही से एक दूजे को लिखते चले जाएँगे वादा तो किया है भूलने का पर मेरी वो नासूर हिचकियाँ तेरा पर्दाफ़ाश करती रहेंगी मेरी तिश्नगी भी कहाँ मात खाएगी तेरी गली से गुज़रने की ये ख़ता भी हम करते चले जाएँगे ज़िंदगी भी हंस रही इस पल हमें देख के ज्ञात उसे हुआ है कि कष्ट हम उसकी साथी को नहीं दे पायेंगे मौत को भी इल्म है की अब तो रोज़ हम  यादों में थोड़े से जिएँगे और थोड़े ख़ुद ब ख़ुद मर जाएँगे ।