क्या ये तन की चाह है

या चित्त की पुकार है

कि ख्वाब दर खयाल तुम

नजर में बस रहे हो किंतु

कण हृदय की पीर के

अश्रु में ढले नही हैं।


हाँ ये तन की चाह है

चित्त की पुकार नही

कि ख्वाब दर खयाल जल

रहा है मन सुमन किंतु

चाह के शुष्क खर

अब तलक जले नही हैं।