तस्वीर में हँसते हुए लड़के
क्या वाकई में खुश हैं
या उन्होंने पर्दा बना रखा है
मुस्कराहट का
जिसके पीछे छुपाये रखते हैं
अपने ग़म,
उदासी,
बेबसी
और तकलीफों का गठ्ठर ।
छुपाकर मुस्कराहट की आड़ में
ग़म सारे,
किसी को भी
तकलीफ नहीं देना चाहता है।
उन्हें मालूम है,
उन्होंने
चुनी है
अपने हिस्से में जिम्मेदारी,
जिम्मेदारी के तले दबे हुए लोग
भूल जाते हैं अपने आपको,
अपने ज़ज्बात को।
अपनी नींद को अपनी रात को।
कुछ समय बाद
पत्थर हो जाते हैं उनके एहसास ।
किसी को भी नहीं पड़ी होती
उनके अहसासों की।
हर कोई आता है
उस पत्थर पर ठोकर मार कर
निकल जाता है।
नहीं होता है उनके पास
वक़्त
किसी को प्यार देने के लिए
किसी का प्यार पाने के लिए,
क्योंकि उन्होंने खुद को
झोंक दिया होता है,
घर को घर बनाने में।
उम्र से पहले समझ और
जिम्मेदारी तले
दबे हुए लड़कों के पास
काम के
सिवा वक़्त की कमी
और ख्वाबों की पाबंदी होती है।
इसलिए डरते हैं वो लड़के
किसी को अपना कहने से
किसी की बात सुनने से
किसी का हाथ छूने से
किसी को हाथ देने से।
मगर वो भी अधिकारी होते हैं
प्रेम के,
उनका भी मन करता होगा
कि
कोई प्यार से माथा उनका चूमे
और कहे
कि बस करो
थम जाओ एक पल के लिए
और अब काम मत करो कोई
आओ बाहों में मेरी आ जाओ
आओ आराम अब करो थोड़ा।
कोई ऐसे उन्हें बाहों में भरे
मिट जाए हर थकन उनकी।
और बेफिक्र होकर यूँ सोये
कि
फिर न जागे कभी दोबारा वो
फिक्र में नींद से उठकर
फिर न भागे कभी दोबारा वो।
Devendra babu