जाने थी वह कौन घड़ी जब प्रज्ञा छली गयी थी ।सारी खुशियाँ मुझे त्याग कर उसके संग चली थी।इन्द्र धनुष भी अब मुझको बेरंग बेरंग दिखता है,पतझड़ भी सावन लगता था जब वो मुझे मिली थी।
जाने थी वह कौन घड़ी जब प्रज्ञा छली गयी थी ।सारी खुशियाँ मुझे त्याग कर उसके संग चली थी।
इन्द्र धनुष भी अब मुझको बेरंग बेरंग दिखता है,पतझड़ भी सावन लगता था जब वो मुझे मिली थी।