लिखना आसान नहीं होता है, हम जो कुछ भी लिखते हैं उसके लिये समाज के प्रति उत्तरदायी हो जाते हैं। हमारा लेख हमारी पहिचान बन जाता है। 
           हमारे द्वारा लिखा गया एक एक शब्द भले ही वह कल्पित हो ! किन्तु उसे हमारे निजी जीवन से जोड़ दिया जाता है। 
हमें हमारी शैली और शब्दों से तोला जाता है। 

           लेखन अपने आप मे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। 
कहीं न कहीं हमारा लिखा हुआ समाज के परिवर्तन में जिम्मेदार होता है। 
         जहाँ एक तरफ कुछ लोग जी जान लगा कर समाज के हित के साहित्य को नये कीर्तिमान पर स्थापित करने में लगे हुए हैं। वहीं एक दूसरा समाज साहित्य को गर्त में ले जाने का भरसक प्रयास कर रहा है। 
         नग्नता और अश्लीलता को मौलिक विचार बताकर  समाज मे परोसा जा रहा है। 
        ऐसे लोगों का विरोध किया जाना चाहिए । 

क्योंकि साहित्य समाज के उत्थान और पतन में बराबर की हिस्सेदारी रखता है, तय हमें करना है कि हम उत्थान चाहते हैं या पतन। 

Devendra babu