कह रही थी जो न बदलेंगे किसी भी हाल में ,
आ गया है आजकल बदलाव उसकी चाल में ।
अब नहीं उठता है उसका फोन दिन में इक दफ़ा ,
वो जो पगलाती थी पहले एक ही मिस्काल में ।
इसलिए भी हार राजा की हमारे हो गई ,
मेरे प्यादे ही छुपे थे भेड़िये की खाल में ।
चाहते हैं छोड़कर सब कुछ चले जाएँ कहीं ,
किन्तु हम अटके हुए हैं मोह के जंजाल में ।
Devendra babu