वो जला कर मुझे चले गए

न आएंगे कभी बिन कहे चले गए

आरजू में थी तनहाइयाँ

अब उमर की दिवार ले कर गए


कभी कोई न आयें यहाँ जो चले गए

मेरी हो गई रातें दिन वो लेकर चले गये

रह गई उनके पास मेरी कहानियाँ

मेरी बची थी कुछ राख़ पानी में बहा गए


साथ मेरे कौन रहा जो थे चले गए

कुछ अंगारे थे साथ जो रह गए

थके थे इतने जिंदगी से कि बहियाँ

चिता को बना कर सदा के लिए सो गए