तानाशाही दांत फैलाये
मानवता को खाने को आतुर है
सारे इश्वर निरुतेर है
मानवता की गोद जिनके लिए
बेहतर है
वही मानवता को
मारने को आतुर है
तानाशाही अपने पंख
फलाये तैयार है
उसने हर दिशा में अपने
दौड़ाये शियार है
कुछ मैदान लाशो को
नाप कर बनाये है
क्या तू, क्या मैं
तानाशाही ने सब निवाले
गिनाये है
असमान में कुछ काले
साये छाये है
सारे परमेश्वर गहरी नींद
सोने गए है
