एक काम,
जो उसका अपना है,
खड़ा है हर कोई,
उसके इस सपने के बीच,
कौन गैर, कौन अपना है?
सुबह से शाम तक
हर पल भटकना है,
सबको खुश रखना है,
एक सपने को पूरा करने में
उसे कितना मरना है।
हर बर्तन घर का,
हर पेट घर का,
हर कपड़ा घर का
उसके भरोसे बैठा है,
छोड़ दे वो काम अपना,
घर में सबका यही सपना है।
मगर उसका अपना काम,
उसका सपना ,
किसी अपने का
कहाँ ऐसा सपना है,
