सुखा पत्ता था मैं

हवा से लड़ा ही नहीं

उड़ता रहा मै

कहीं पर रुका नहीं

कहाँ गिरता मैं

गिरने लायक बचा नहीं

जुल्फों पर सजता मैं

कोई गुलाब था ही नहीं

बरस जाता टूट कर मैं

बादल जो मै था ही नहीं

जल गया धुप से मैं

जला देता कोई था ही नहीं