सोचता हूँ मैं हज कर आऊ

उसकी की गलियों में हो आऊ


दुनियां मिलती है खुदाओं से

अपने खुदा से मैं भी मिल आऊ


क़ुरबानी इश्क की जहाँ दी थी

मंजर उस दरख्त का देख आऊ


कोई तो निशान बाकी होगा उसका

गली का उसकी मुआइना कर आऊ


सुना है बहुत बिकता है दर्द ए इश्क

मुफलिसी में काम ये भी कर आऊ