सलीब इल्जामों की सर से कोई उठता क्यों नहीं
खुदा कोई तेरी दुनिया का काम आता क्यों नहीं
गहरा होगा ज़ख़्म कोई ,आँखों से आंसू आते क्यों नहीं
न बने, बन के दोस्त , रकीब ऐसा कोई मिलता क्यों नहीं
चीर दे दर्द का सीना खंजर ऐसा कोई मिलता क्यों नहीं
दफ़न कर आएं गम जहाँ, समसान कोई मिलता क्यों नहीं
बहुत बड़ा है शहर तेरा, आदमी यहाँ कोई बसता क्यों नहीं
जिस्म पे ख़त्म हो जाता है इश्क रूह तक जाता क्यों नहीं
खुबसूरत है कोबरा बहुत सिने में इसके दिल क्यों नहीं
बुढा हो गया है आदमी दांत जहर के टूटते क्यों नहीं
