पिघलते पहाड़
ज़ोर से विलाप करते हैं,
मानव यातनाओं की व्यथा सुनाते।
फटी-खरोंची सड़कें,
धरती के सुंदर शरीर को दाग़दार करतीं।
अब, पूरी घाटियाँ
दूर से दिखातीं हैं घाव,
मानव प्रगति और विजय के।
प्रकृति का ग़ुस्सा ग़रीबों पर,
ध्यान देने योग्य और दुखद है।
राष्ट्र के रईस,
नरम कुर्सियों पर बैठ, योजनाएँ बनाते,
पीड़ितों को बचाने की, मुनाफ़ा कमाते,
दान की राशि से।
गिरते पेड़, कीचड़ में दबे,
ग्रामीणों की व्यथा का शोर गूँजाते—
यह ठेकेदारों का अपराध नहीं,
बल्कि विकास का भजन,
प्रगति का भक्ति गीत।
