मैं क्यों पढ़ूँ उनकी किताबें,
क्यों सुनूँ स्याह शब्दों की गाथ?
बात-बात पर पूछते मेरी जात,
कौन हूँ मैं, क्यों मानूँ उनकी बात?
किताबों के पन्नों में जकड़ी स्याही,
मेरी जात को बनाती बदनाम, काली।
न मैंने लिखी, न मेरे लिए बनी,
फिर क्यों बाँधे मुझे यह किताबों की लाठी?
जिन्होंने लिखी, जिनके लिए रची,
वही रखें यह किताबें सँभाली।
मुझे दूर करती, नफरत की आग में,
मेरी नहीं, ये किताबें पराई।
मैं अपनी राह खुद चुन लूँगा,
अपनी कहानी खुद लिख लूँगा।
न उनकी स्याही, न उनका आलम,
मेरा सच बनेगी मेरी कलम।
