लोकतंत्र की उम्र उतनी है

जब तक

विशिष्ट समूह पैदा न हो

जब तक

दिल दिमाग पर हावी न हो

जब तक

अहंकार सर पर न बिठा हो

जब तक

कार्यपालिका सेवार्थ हो

जब तक

डर जनता के सिर पर

इतना भारी न हो

कि सिर और पीठ झुक जाये

जब तक

रोटी इतनी महँगी न हो

कि तन बेचना पड़ जाय

जब तक

बच्चो के हाथों भीख के कटोरे

न हो

जब तक

किशान पैदा कर सके भूख की खातिर

लोकतंत्र की उम्र उतनी है

जितना संतुलन हो खाइयों में