करो मुक्त अब इस चार दीवारी से,
तोड़ दो दीवारें अब इस कुंएं की,
मिल जाने दो सागर की विशालता में,
विधाता हो क्यों डरते हो अपनी वैद्यता से,
सादिया बीती मिटी न कुछ लकीरें,
विभाजन ही सत्य है, क्या सत्य है लकीरें ?
तुम्हारे नाम की खींच कर कुछ लकीरें,
मानवता कब तक पीटती रहेगी लकीरें,
हो तुम छोटे, बड़ी होती जाती लकीरे,
करने को छोटा तुम्हें लम्बी खींच दी लकीरें
सत्य हो तुम और है सत्य ही तुमसे,
फिर मिटती क्यों नहीं लकीरें तुमसे
शास्वत हो तुम फिर भी काटती लकीरें,
हर लकीर खींच दी जाती नाम से तेरे,
जोड़ दी जाती हर साख पेड़ से तेरे,
सागर में उठती असीमित लहरें,
सागर से ही बनती सागर में मिटती लहरें ,
सागर के बिना है भी क्या लहरे?
