तोड़ देगा ओ गरूर मेरा क्या पता था

कुछ पानी, कुछ मिट्टी और कुछ राख़

सिवाय इसके क्या था, क्या पता था


मेरा ख़ुदा मुझ में था क्या पता था

कुछ मंदिर, कुछ मस्जिदें , कुछ गिरजे

सिवाय इसके क्या था, क्या पता था


मंज़िल इंसानियत थी क्या पता था

कभी जमीन, कभी असमान, कभी चाँद

मंज़िल मेरी मेरे साथ थी,क्या पता था


बस इतनी थी दुनिया मेरी क्या पता था

रस्सियाँ माप की जेबों में लेकर घूमता रहा

मेरी जमीन मेरे साथ थी, क्या पता था


आदमी भी ख़ुदा होगा क्या पता था

कुदरत को मुठी में ले लेने की जिद थी

वज़ूद भी मेरा न था, क्या पता था


पढ़ेगा नहीं कोई मुझे पता था

बस खुद से कुछ बातें करी ली

सिवाय इसके क्या था, क्या पता था