छोटी पड़ी दुनिया लालच को
चला आस्मां की ओर
छोटी पड़ी दुनिया नफरत को
लगी हथियारों की होड़
लगी धर्मों की खोज
पाप छिपाने को मिला न कुछ और
लगा आदमी आदमी को खाने
धरा पर जो बचा न कुछ और
ओड़ने लगा आदमी, आदमी की खाल
ख़त्म हुआ जो कपड़ो का दौर
धर्म का पताशा, देशी की रेवाड़ी
चूस चूस कर वक्त बिताया
मिला न जो कुछ और
समाज की दुनिया ख़त्म हुई अब
आया नया दौर
हांफ हांफ कर मरेगी दुनिया
शुरू हुई, अब रोटी की दोड़
