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कलम का तराशा तुआ है तू

मेरे कितने पास मे है तू

किस दगे की आस मे है तू


दुनिया से दूर ले आया है तू

हादसों का माहिर भी है तू


न रहू मैं और न रहे दुनिया

रहे तू ही इसी लायक है तू


आदमीं खुदा होने को है

सुना है कि सब देखता है तू

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