न घर उसका काम आया, जो आई कज़ा, न नाम उसका काम आया

दिलासा दिल को दे दिया , इल्ज़ाम किसमत और कर्म के नाम आया


दिन रात बरसता रहा पानी, कितनी बुझी प्यास, कितना काम आया

कुछ तो गलती अपनी थी, जो भी हुआ, इल्जाम शैलाब के नाम आया



दिल के छाले, दीवारों की दरारे, कमाना उम्र भर का न काम आया

कितनी दुआए और मांगे, कतार लम्बी थी कहाँ किसी का नाम आया



उम्र खप्पा दी एक आशियाना बनाने में, इस बरसात में न काम आया,

खोजती रही पूरी रात जिंदगी, मौत की सूची में किस किस का नाम आया


मलबे ने रोक दी थी जब सांसे, कहाँ दिल का धडकना काम आया

खत्म होता जो जिंदगी का मंजर देखा, बंद होतें होठों पे माँ का नाम आया


दुनियां पहुंची यूँ तो बरबादी पर, मरने वालों के, कहाँ कोई काम आया

अबके चिराग पानी ने बुझा दिए, इल्जाम फिर भी हवाओं के नाम आया