कभी शैतान से, कभी खुदा से डरता हूँ

गरीब हूँ , मैं अपनी आहट से डरता हूँ

कभी नेता से कभी नौकर से डरता हूँ

गरीब हूँ , मैं खुद पे काबिज़ रहता हूँ

मुझसे मांगते है, खुदा को क्या देता हूँ

गरीब हूँ , फटी चादर से निहारता हूँ

मै अमिरों की नियत से डरता हूँ

अपनी ही खाल मै भूसा भरता हूँ

मैं अमिरों का पैखाना ढोता हूँ

कभी किताबों से, कभी वर्दी से डरता हूँ

गरीब हूँ , रोटी के सपने देखता हूँ

अनाज को मैं ही तो खुदा कहता हूँ