घिरी है, डूबी है, जहर में,
खोई है अपनी ही मौज में,
शोर है हर तरफ, देश में, विदेश में,
दिल्ली लीन ध्यान में,
हज़म करती विष को,
कर मौन, धीर धर हृदय को,
क्यों जाऊं हिमालय मैं ?
जो देख पाऊं यही शिव को
हर चेहरा रंगा नील वर्ण में,
है दिल्ली शिव के दिल में,
जो मौन है इतने जहर में,
क्या बिगाड़ेगी ये ह्वावाए?
दिल्ली है शांत शिव सी.
पीती हरदम काली
हवाओं को अघोर सी
दिल्ली है शांत शिव सी
