कभी खुद को भी जान लेते तो अच्छा होता,
कुछ न कहते चुप रहते तो अच्छा होता।
भागते रहे सिकंदर कितने, दुनिया जीतने,
सेक लेते कहीं बैठ कर धुप तो अच्छा होता।
जहर पीला कर मारे कितने सुकरात मैंने,
कुछ शराब उनकी पी लेता तो अच्छा होता।
खुद की तलाश में खुद को कितना बिखेर दिया ,
कण कण में बिखरकर मिट जाते तो अच्छा होता।
एक पहेली सा हमेशा उलझा रहा मैं खुद में ही,
इलज़ाम सर न होता खुद को जान लेता तो अच्छा होता।
