छू कर कभी मिरे गालों को निकल
बन कर आंसू दिल से बहार निकल
बीती सारी उमर दिल की दुनिया में
आ आँखों में कभी तो बहार निकल
हाथ में पत्थर ले खड़ी है दुनियां
है इश्क अगर बहसत से बहार निकल
है कोई दुनिया सिवाय तेरे भी
खुदगर्ज़ी से कभी तो बहार निकल
दुनियां का रंग ही कुछ और है
मंदिरों मस्जिद से बाहर निकल
