अदृश्य !
धीरे धीरे तुम्हारी
असीम गहराईयों में
डूब जाने दो
अदृश्य !
भीतर और भीतर
गहरा और गहरा
तुम्हारे गर्भ में छिपा
सत्य
जान लेने दो
अदृश्य !
अँधेरे की दिवार
के उस पार
प्रकाश का विस्तार
निराकार !
निराकार !
अदृश्य !
आकार का अहंकार
होने का अहंकार
टूट जाने दो हर दिवार
रोके हुए है हर दिवार
फैलने को है निराकार
अदृश्य !
दीवारों में कैद
जंजीरों में कैद
दीवारों से रिश्ता
जंजीरों से रिश्ता
प्रेम दीवारों से
प्रेम जंजीरों से
अदृश्य !
उतर जाने दो
वहां तक
जहाँ से फिर न लौटना हो
न शब्द कोई
न आकार कोई
मुझ में मै को
विलीन होने दो
अदृश्य !
दृश्यों से भरा रंगमंच
जिंदगी का
ये मंच दुनिया का
हर दृश्य मिट जाने दो
अदृश्य !
