होना चाहिए ऐसा भी समाज जिसमें,

मज़दूर को भी गौरव कहा जाता हो,

सबकी कहानियाँ पूरी करते-करते,

वह अपनी कहानी भी पूरा करता हो।


कहानी ही है एक अधूरी सी,

वह घर से निकला है रोटी की तलाश में,

कभी-कभी कहीं खो जाता है,

आँखें ढूँढती हैं, रास्ता सूना रह जाता है।