है कहानी अधूरी तो मज़दूर हुआ,
कहानी पूरी हो जाती तो सेठ न हो जाता,
मज़दूर ही तो बन्दूक बनाता है,
मज़दूर ही तो कपड़ा बुनता है।
बनी जिससे वर्दी पहन सिपाही बनता है,
कंधे पर रख बंदूक देश का गौरव हो जाता है,
मज़दूर मज़दूर ही रह जाता है,
माँगे हक़ तो पूँजीवाद निगल जाता है।
बनाई थी लाठियाँ जो उसी ही ने,
उन्हीं से ही निर्ममता से पीटा जाता है,
रही जिसकी कहानी अधूरी,
वह मज़दूर ही रह जाता है।
