कहाँ था तू ? अबके, सावन में

बुझ गए दीपक, कितने घरों के

बेघर हो गए कितने,अपने घरों से

न मिल पाए, अपने अपनों से

कहाँ था तू ? अबके, सावन में


बेकाबू होकर बरसे बादल

बहा पानी होकर पागल

धरती रोई, हरी भरी आभा खोई

कौन रोक पाया उसे

अबके, सावन में


खेतों की माटी ले गया पानी

हरी भरी फसलों को सुखा गया

था क्या कोई बदला पुराना

ले गया पानी, बरसा पानी

कयामत बनके

अबके, सावन में


शिक्षा थी कोई किसी को

बदला था कोई किसी का

फिर जालिम बच गया

फिर गरीब मारा गया

अबके सावन में