अब मंहगाई कोई मुद्दा नहीँ
बढ़ जाए तो कोई गिला नहीँ
अब भूख लगती बहुत कम है
न भी मिलें रोटी तो कोई गिला नहीँ
कुछ पास होगा तो डर होगा
लूट जाए शहर सारा कोई गिला नहीं
बेरोज़गारी है कहाँ दुनियां में बाकी
मिल जाए तेरी चाकरी कोई गिला नहीं
चारों तरफ़ उसकी जीत का शोर है
न हारी मुफ़लिसी कोई गिला नहीं
लोग क़्या चाहते है तू समझ न पाया
नए लोग नई सोच कोई गिला नहीं
