वक्त की हैसियत नज़र आई

चोंट जब दिल की फिर उभर आई


जिसको चाहा था मैंने बचपन से

मुद्दतों बाद वो शहर आई


आज रौनक है खिलखिलाहट है

और मस्ती की है लहर आई


रू-ब-रू हो के ख़बर दी शादी की

मै इसी के लिए हूं घर आई


हो के सब दूर भूल जाते है

इस कहावत को सच वो कर आई


कवि अजय राज उपाध्याय ✍️