सूना सूना लगता है ये सारा धरती अम्बर
कटती न है मेरी सांसे जब से रूठे हो हम पर
फिर से नरम हथेली से
सिर को तुम सहला दो
फिर से मेरी हर सुबह को
अपना रूप दिखा दो
हर रातें संग तेरे बीतें तुम संग हो हर सुबह पर
कटती न है मेरी सांसे जब से रूठे हो हम पर
फिर से मेरा इंतजार
अपने दरवाजे से कर लो
उन सूनी सूनी अाँखों से
फिर सारी बातें कह दो
मुस्कान सजा देना मेरे आने पर अपने कलियों से होठों पर
कटती न है मेरी सांसे जब से रूठे हो हम पर
तेरे ना होने से गलियों मे
पतझड़ आ छाया है
प्रिये तुम्हारे जाने से गलियों ने
जैसे गहरा सदमा खाया है
फिर से चंचल पन ले कर आ जाओ इन गलियों पर
कटती न हैं मेरी सासें जब से रूठे हो हम पर