हवा की ये फितरत, ये रुख का बदलना
मुहब्बत में भी है, संभल के तु करना
सभी जानते है, अदाओं के जलवे
निगाहों के जादू , से बच के तु रहना
अनूठी सी खुश्बू ,भी आए गी तुझ से
छुपाना इसे और, ज्यादा न हंसना
करिश्मे बहुत है, गजब जायका है
हों हासिल तजुर्बे ,तो क्या इसको चखना
अजय चाहते हो ,नई राह तुम भी
तो है जिन्दगी में ,जरूरी भटकना
अजय राज उपाध्याय ✍️


