एक अपने सपनों का मंदिर हो जहाँ,शीतल प्रेम सुगंध बसें
जहाँ दुनिया की ना रीति नीति हो, बस हम दोनों ही संग रहे
वहाँ सुंदर सा एक उपवन हो
जहाँ पंछी कलरव करते हों
कोयल की मधुरिम वाणी सुन
श्रवणरंध्र ना थकते हों
फूलों की भीनी खुशबू ले
जहाँ मस्त हवायें चलती हों
कल कल कल करती सरिता
जहाँ नित्य निरंतर बहती हों
वहाँ तेरे केशों के पाशों मे बधं,आखें तुम पर टिकी रहें
एक अपने सपनों का मंदिर हो,जहाँ शीतल प्रेम सुगंध बसें
वहाँ पूनम वाली रातों में
जब चाँदनी खिल के बिखरे गी
उस रोशनी के स्पर्श मात्र से
वो और भी ज्यादा निखरे गी
यौवन की वो प्यारी मूरत
जब बहों आ शर्माये गी
आँखों आँखों जब वो
मधुपान करती जाये गी
तब मन की अभिलाषा होगी कि वह वक्त वही पर रुका रहे
एक अपने सपनों का मंदिर हो जहाँ शीतल प्रेम सुगंध बसें